सोशल मीडिया की भाषा का बदलता स्वरूप
सोशल मीडिया की भाषा के बारे में बात करने से पहले यह जानना जरुरी है कि सोशल
मीडिया क्या है? या सोशल मीडिया में क्या होता है| हालाँकि आज सोशल मीडिया संचार का सबसे प्रसिद्ध
माध्यम बन चुका है| सोशल मीडिया का विकास संचार के तकनीकी विकास के साथ हुआ | भारत में अंग्रेजों के शासनकाल के समय प्रिंट
मीडिया और रेडियो का प्रयोग होता था वहीं
अंग्रेजों के जाने के बाद दूरदर्शन ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी| पहले जहाँ संचार के माध्यमों में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक (रेडियो व टीवी) का नाम आता था
वहीं आज न्यू मीडिया नाम से प्रचलित इस सोशल मीडिया ने अपनी एक अलग जगह बना ली है| इन्टरनेट की सहायता से प्रयोग किये जाने वाले इस
माध्यम में फेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, ब्लॉग जैसी बहुत सी साइट्स है, जिन पर लोगों को अपने विचार व्यक्त करने की
आजादी मिलती है| सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है
जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के लोगों के हाथ
लगा है, जिसके जरिए वे न
सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैं, बल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम
घटनाओं से अवगत भी होते हैं।
एक समय था जब सोशल मीडिया पर ज्यादातर अंग्रेजी भाषा का ही प्रयोग होता था और यह हिन्दी
भाषियों के लिए सोशल मीडिया की राह में एक बाधा की तरह देखा जाता था। हालांकि यह
बात और है कि हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। लेकिन
अब बदलते वक्त के साथ-साथ हिन्दी भाषा ने सोशल मीडिया के मंच पर दस्तक देकर अपने
अस्तित्व को और भी बुलंद तरीके से स्थापित किया है। सोशल मीडिया की भाषा के बारे
में वरिष्ठ पत्रकार और भारतीय भाषाओं के संवर्धन के लिए सक्रिय सम्यक न्यास के
ट्रस्टी राहुल देव का मानना है कि भाषा के
दो प्रमुख आयाम हैं। एक, उसका शुद्ध भाषिक आयाम जिसमें उसके शब्दों, वाक्य रचना, व्याकरण, शब्दकोश आदि पर ध्यान रहता है। दूसरा, भाषा का सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक
संदर्भ जिसमें उसके इन संदर्भों में प्रयोग, परिवर्तनों, अर्थों, प्रभावों आदि पर ध्यान होता है। आज संसार की
लगभग हर भाषा पर सोशल मीडिया के प्रभाव को महसूस किया जा रहा है, उसे समझने की कोशिश हो रही है और विमर्श हो रहा
है। इस नए माध्यम ने हर नए माध्यम की तरह हर भाषा के प्रयोग के तौर-तरीकों, शब्दकोश, शैली, शुद्धता, व्याकरण और वाक्य रचना को प्रभावित किया है। यह
असर लिखित ही नहीं, बोलने वाली भाषा पर भी दिख रहा है| जब ईमेल आया तो कहा गया
कि पत्र लिखना ही समाप्त हो जाएगा। वह तो नहीं हुआ, लेकिन हाथ या टाइपराइटर से पत्र लिखने का चलन
जरूर खत्म हो गया। पर बात यहीं तक नहीं है। अब एसएमएस, ट्विटर, फेसबुक और वाट्सएप ने बहुत से लोगों के लिए ईमेल
को भी अनावश्यक और अप्रासंगिक बना दिया है। सोशल मीडिया ने अपनी एक नई भाषा गढ़ ली
है। भाषा और शब्दों के सौंदर्य, मर्यादा, गरिमा और स्वरूप की चिंता करने वाले सभी इस नई भाषा के
प्रभाव और भविष्य पर तो चितिंत हैं ही, इस पर भी हैं कि इस खिचड़ी, विकृत, कई बार अटपटी भाषा की खुराक पर पल-बढ़ रही किशोर
और युवा पीढ़ी वयस्क होने पर किसी भी एक भाषा में सशक्त और प्रभावी संप्रेषण के
योग्य बचेगी या नहीं। यह खतरा इसलिए भी गंभीर होता जा रहा है कि नई पीढ़ियां
पाठ्य-पुस्तकों के अलावा कुछ भी गंभीर, स्वस्थ, विचारपूर्ण लेखन, साहित्य, वैचारिक पठन से लगातार दूर जा रही हैं। अच्छी, असरदार भाषा अच्छा पढ़ने से ही आती है। अच्छी
भाषा के बिना गहरा, गंभीर विचार, विमर्श, चिंतन और ज्ञान-निर्माण संभव नहीं। वे पीढ़ियां
जो विद्यालयों की मजबूरन पढ़ाई के बाहर केवल या अधिकांशत: यह खिचड़ी और भ्रष्ट
भाषा ही पढ़ लिख रही हैं उसकी बौद्धिक क्षमताएं ठीक से विकसित होंगी कि नहीं? अगर हमारे भावी नागरिक गंभीर चिंतन और विमर्श
में सक्षम ही नहीं होंगे तो उसका उनके विकास के अवसरों और व्यापक सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, बौद्धिक, राजनीतिक विकास पर कैसा असर पड़ेगा, इस पर अभी हमारे बौद्धिक समाज, सरकार और नीति-निर्माताओं का ध्यान बहुत कम गया।
वर्तमान में सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग अब हिन्दी भाषा का प्रयोग भी न केवल
खुलकर बल्कि गर्व के साथ करते हैं। इससे पहले सोशल मीडिया पर अंग्रेजी का प्रयोग
कई लोगों के लिए सिर्फ जरूरत या मजबूरी हुआ करता था, लेकिन अब हिन्दी का प्रयोग, हिन्दी प्रेमियों के लिए प्राथमिकता और गर्व का
विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर हिन्दी का
प्रयोग, लोगों के लिए
भीड़ से अलग दिखने का बेहद आकर्षक तरीका भी साबित हुआ है। जहां फेसबुक या ट्विटर
पर अंग्रेजी में लिखे गए पोस्ट और कमेंट्स की भीड़ में हिन्दी में लिखी गई पोस्ट
या फिर कमेंट प्रयोगकर्ताओं को ज्यादा जल्दी आकर्षित करते हैं, वहीं हिन्दी भाषा का समृद्ध एवं अलंकृत होना, किसी भी प्रस्तुति को स्वत: ही महत्वपूर्ण बनाने
में सहायक सिद्ध होता है। न केवल फेसबुक
या ट्विटर, बल्कि अब व्हाट्सएप और टेक्स्ट मैसेज को भी सार्थक बनाने और मैसेज की ओर ध्यान
आकर्षित करने के लिए विभिन्न कंपनियां तक हिन्दी भाषा का सहारा ले रही हैं। वे
जानती हैं कि हिन्दी भाषा का विस्तार काफी अधिक है और अगर उन्हें भी खुद को दूर तक
स्थापित करना है तो वही भाषा चुननी होगी, जिसके प्रति पाठक या ग्राहक सहज और पारिवारिक
महसूस करता हो। इसके लिए हिन्दी से अच्छा विकल्प और कोई हो ही नहीं सकता| वरिष्ठ पत्रकार और सोशल साइट्स के विशेषज्ञ
पीयूष पांडे ने सोशल साइट्स की भाषा पर सवाल उठाए कि यह नई भाषा एक नई दिशा ले रही
है। इसमें अनुशासन का अभाव दिखता है। अपनी मर्जी की भाषा इंटरनेट पर लिखी जा रही
है। पीयूष पांडे ने कहा कि हालांकि हमें ये भी समझ लेना चाहिए कि इंटरनेट पर भाषा
पर किसी किस्म की बंदिश लगाना तकनीकी तौर पर असंभव है। ऐसी सूरत में हमें रास्ता
निकालना है कि कोई इंटरनेट, फेसबुक का अनुचित इस्तेमाल ना कर जाए। पीयूष पांडे कहते है
कि धीमे-धीमे ये सहमति बन रही है कि ये नया माध्यम नए लेखकों के लिए बहुत
सकारात्मक साबित हो रहा है।
फेसबुक के कई ग्रुप हैं, जो हिन्दी में ही चैट करना पसंद करते हैं। लिंक्डइन पर भी
हिन्दी का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और अनेक फीचर्स वहां हिन्दी में देखे जा सकते
हैं। सोशल मीडिया पर हिन्दी के बढ़ते प्रभाव के कारण ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
और अनेक केन्द्रीय मंत्रालयों के सोशल मीडिया अपडेट में लगभग 40 प्रतिशत कंटेंट हिन्दी में होता है। यह हिन्दी
बोलचाल की हिन्दी है और इसका उद्देश्य मैसेज को कम्युनिकेट करना सोशल मीडिया पर
हिन्दी भाषा को और भी विस्तारित करने का कार्य किया ब्लॉगर्स ने। हिन्दी ब्लॉगर्स
की संख्या पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ी है। वहीं हिन्दी ब्लॉगिंग के जरिए ऐसे
लोगों को विचारों की अभिव्यक्ति का बेहतरीन मंच मिला, जिनके लिए भाषा की रुकावट थी। वर्तमान में
फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग्स के अलावा, सोशल मीडिया में हिन्दी को और भी बेहतर तरीके से
विस्तारित करने में व्हाट्सएप भी अग्रणी है, जिस पर हिन्दी सामग्री को प्रसारित करने के लिए
हिन्दी भाषा का प्रयोग सर्वाधिक होता है। सोशल मीडिया पर जोक्स, मैसेज या अन्य सामग्री का ज्यादा से ज्यादा
प्रचलित और प्रसारित होने का कारण भी हिन्दी भाषा ही है, क्योंकि यह उपयोगकर्ता और पाठक को सीधे और सरलता
से जोड़ने का कार्य करती है|
हिन्दी भाषा को सोशल मीडिया पर हाथों हाथ लिए जाने का एक कारण यह भी है, कि हिन्दी भाषा अभिव्यक्ति का एक बेहतरीन माध्यम
है। इसके भावों को समझने में असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता और लिखी गई बात
पाठक तक उसी भाव में पहुंचती है, जिस भाव के साथ उसे लिखा गया है। हिन्दी के तीव्र विस्तार
का ग्राफ सोशल मीडिया पर मौजूद हिन्दी प्रेमी वर्ग की ओर इशारा करता है, जो लगातार वृद्धि करता देखा जा सकता है। यह
हिन्दी भाषा की सुगमता, सरलता और समृद्धता का ही कमाल है, कि विश्व स्तर पर आज हिन्दी सोशल मीडिया के मंच
पर खुद को सुशोभित कर पाई है और काफी पसंद की जा रही है| सोशल मीडिया की भाषा
के दो रूप देखने को मिलते है एक तो बुद्धिजीवी वर्ग जिसमें लेखक, पत्रकार, साहित्यकार आदि आते हैं जबकि दूसरी ओर वह वर्ग
है जिसे अपने मन की बात कहने के लिए कोई जगह नहीं मिलती तो वह इन सोशल साइट्स पर भाषा
के अधूरे ज्ञान का प्रयोग कर वह कुछ लिखता है या लिखने की कोशिश करता है यानी कि
आम आदमी| यहाँ मै कुछ
उदाहरण शामिल कर रही हूँ जो दोनों वर्गों से सम्बंधित हैं|
जानेमाने शिक्षाविद आनंद प्रधान का ब्लॉग तीसरा रास्ता में शामिल लेख के कुछ
अंश “हिंदी मीडिया का ‘अंग्रेजी लाओ’ आंदोलन” अगर कोई आंदोलन यानी
धरना-प्रदर्शन-भूख हड़ताल दिल्ली में हो, उसमें हजारों युवा शामिल हों, उसमें शामिल होने के लिए
सांसद-विधायक-नेता-लेखक-बुद्धिजीवी पहुँच रहे हों और आंदोलन के मुद्दे से देश भर
में लाखों युवा प्रभावित हों तो पूरी सम्भावना है कि वह आंदोलन अखबारों/न्यूज
चैनलों की सुर्खी बने. यही नहीं, यह भी संभव है कि अखबार/चैनल खुलकर उस आंदोलन के समर्थन में
खड़े हो जाएँ. लेकिन दिल्ली में संघ लोकसेवा आयोग (यू.पी.एस.सी) की परीक्षाओं में
अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व और हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं की उपेक्षा और बेदखली
के खिलाफ चल रहा आंदोलन शायद इतना भाग्यशाली या कहिए कि टी.आर.पी बटोरू नहीं है कि
वह अखबारों/चैनलों की सुर्खी बन सके.”
पुण्य प्रसून बाजपेयी – “बंदूक का जवाब कलम से देंगे। ये कोई नारा नहीं, पाकिस्तान में मीडिया का सच है। पाकिस्तान में
जियो न्यूज चैनल के पत्रकार मूसा खानखेल के शरीर में पैंतीस गोलियां दागी गयीं।
फिर सर कलम कर दिया गया। 28 साल के पत्रकार मूसाखानखेल उस रैली को कवर करने स्वात गये
थे, जो मुल्लाओं की
जीत का जश्न था। या कहें पाकिस्तान सरकार के घुटने टेकने का जश्न था। जिस सरकार ने
घुटने टेक दिये वहां का पत्रकार छाती तानकर खड़ा हो सकता है ....वह भी पाकिस्तान
में, यह किसी भी
भारतीय के लिये अचरच की बात है। क्योंकि भारत के चश्मे से पाकिस्तान को देखने का
मतलब कट्टमुल्लाओं की फौज नज़र आती है। फिर मुंबई हमलों के बाद से तो पाकिस्तानी
मीडिया को पाकिस्तान के ही रंग में रंगा माना जा रहा है। लेकिन पत्रकार मूसा
खानखेल की हत्या के बाद स्वात इलाके में जा कर पाकिस्तान के पत्रकारों ने जिस
हिम्मत से भविष्य के संघर्ष के संकेत दिये, उससे भारतीय मीडिया या भारत के पत्रकारों का दिल
जरुर हिचकोले खा रहा होगा। खासकर जब बात पाकिस्तान और भारत के मीडिया की होती है
तो सभी के दिमाग में पाकिस्तान की बंदिशें मीडिया को भी मुल्लाओं के रंग में रंग
देती है। लेकिन जब मुल्लाओं के खिलाफ ही जम्हुरियत का सवाल पाकिस्तान का मीडिया
उठा रहा है तो भारत में पत्रकारो को अपने भीतर झांकना होगा।
‘बेबाक दस्तक’ ब्लॉग में उपेन्द्र चौधरी के एक लेख की भाषा के कुछ अंश “‘अर्णब मोदी का
कुत्ता है’।आज यह वाक्य ही ट्विटर पर हैशटैग के साथ टॉप ट्रेंड कर रहा है। यह
वाक्य किसी भी सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं है। हम ये भी तो नहीं कह सकते कि हमारा
समाज ही सभ्य नहीं बन पाया है।प्रश्न है कि आख़िर निजी दायरे में इस्तेमाल की जाने
वाली यह भाषा औपचारिक मंच पर किस तरह दाखिल हो गई, इस तरह की भाषा आख़िर क्यों इस्तेमाल की जा रही
है और ज़ाहिरी तौर पर यह सवाल बेमानी है कि वो कौन से लोग हैं,जो अर्णब के लिए इस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं,क्योंकि इतना तो साफ़ है कि ये वही लोग हैं,जो फ़ेसबुक के सामान्य से अलग ट्विटर पर कुछ
ख़ास हैं। आख़िर ख़ास हैं,तो ये आम ज़बान में अर्णब का सौंदर्यीकरण क्यों कर रहे हैं ?”
इमोजी और स्माइली
सोशल मीडिया की नई भाषा है। प्रभात खबर में प्रकाशित एक लेख ‘इमोजी यानी पढ़ो नहीं देखो, मन के भावों की भाषा’ में इमोजी पर की गई एक
टिप्पणी- “हमारी लिपियों में हाल में
स्माइली शामिल हो गई और हमें पता नहीं चला. अब पिक्टोग्राफ, ईडियोग्राम्स और इमोटिकॉन्स
का ज़माना है, जिनमें सबसे ज्यादा धूम मचा रहा है इमोजी.
शुरू में इमोजी कई तरह की भावनाओं को व्यक्त करने वाले मनोरंजक चेहरे मात्र थे. अब
वे एनिमेटेड भी हैं यानी चलते-फिरते, रोते-हँसते, गाते-मुस्कराते हैं. इनकी तादाद बढ़ती जा रही है. पहले ये सिर्फ बच्चों का
मनोरंजन करते थे, पर अब ये बड़ों के मन की बात भी कह रहे हैं
और संजीदा भाषा की जगह ले रहे हैं.”
सोशल मीडिया पर हिन्दी भाषा के विस्तार की गति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता
है कि अप्रैल 2015 तक देश में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या 14.3 करोड़ रही, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ताओं की
संख्या पिछले एक साल में 100 प्रतिशत तक बढ़कर ढाई करोड़ पहुंच गई जबकि शहरी इलाकों में
यह संख्या 35 प्रतिशत बढ़कर 11.8 करोड़ रही। सबसे खास बात यह है, कि न केवल उम्रदराज भारतीय, बल्कि अंग्रेजी का अच्छा-खासा ज्ञान रखने वाले
युवा भी अब सोशल मीडिया पर हिन्दी भाषा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
सोशल मीडिया पर हिन्दी का उपयोग करने वालों में भारत के हिन्दीभाषी राज्यों के
लोग ही नहीं, दुनियाभर के लोग शामिल हैं। यूएसए, रूस, स्पेन, यूक्रेन, यूएई, जापान, चीन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और वेस्टइंडीज के अलावा कुछ अन्य
देशों में भी विदेशी मूल के अनेक लोग सोशल मीडिया पर हिन्दी में सक्रिय हैं। इनमें
वे लोग भी शामिल है, जो शौक से हिन्दी सीख रहे हैं और जिन्हें भारतीय संस्कृति
से लगाव हैं।
संदर्भ –ग्रन्थ सूची
1 सोशल
मीडिया - विकिपीडिया, https://hi.wikipedia.org/wiki/सामाजिक_मीडिया
4 सोशल
मीडिया एवं हिन्दी विमर्श | NewsWriters.in,www.newswriters.in › ऑनलाइन
पत्रकारिता
5 सोशल मीडिया और हिंदी - दैनिक जागरण: हिंदी न्यूज़ www.jagran.com/.../apnibaat-social-media-and-hindi
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